यूसीएफ ध्वस्तीकरण मामले में अब प्रबंधक के 18 सितंबर के आदेश एवं 75 फीसदी काम पूरा होने के बाद मलबे-स्क्रैप की निकासी पर सख्ती, पहले की निकासी के हिसाब पर उठे सवाल।
हल्दूचौड़(नैनीताल)।
उत्तराखंड राज्य सहकारी संघ (यूसीएफ) के सोयाबीन एवं वनस्पति कॉम्प्लेक्स में चल रहे ध्वस्तीकरण कार्य का करीब 75 फीसदी हिस्सा पूरा होने के बाद मलबे और स्क्रैप की निकासी को लेकर 18 सितंबर 2026 को जारी कार्यालय आदेश ने निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदेश में ध्वस्तीकरण से प्राप्त मलबा, लोहा, ईंट, लकड़ी तथा अन्य उपयोगी और स्क्रैप सामग्री को परिसर से बाहर ले जाने के लिए विस्तृत अभिलेखीय एवं निगरानी व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की गई है।

आदेश के अनुसार अब ध्वस्तीकरण से प्राप्त किसी भी सामग्री को अवर अभियंता मानवेन्द्र सिंह और इलेक्ट्रिशियन हरीश चंद्र काण्डपाल के संयुक्त हस्ताक्षर के बिना स्थल से बाहर नहीं ले जाया जा सकेगा। सामग्री बाहर भेजने से पहले उसका प्रकार, मात्रा अथवा संख्या, वाहन संख्या, दिनांक और समय निर्धारित रजिस्टर में दर्ज करना होगा। इसके बाद संयुक्त हस्ताक्षर से ही सामग्री को बाहर ले जाने की अनुमति होगी।
मुख्य गेट पर तैनात कर्मचारी को प्रत्येक वाहन की आवाजाही का पूरा रिकॉर्ड रखने के निर्देश दिए गए हैं। इसमें वाहन संख्या, चालक का नाम, सामग्री का विवरण, मात्रा, निर्गमन का समय और संबंधित संयुक्त हस्ताक्षर का मिलान करना होगा। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि निर्धारित प्रक्रिया अथवा अभिलेखीय प्रविष्टि के बिना सामग्री ले जाने वाले वाहन को बाहर नहीं जाने दिया जाएगा और इसकी सूचना तत्काल उच्चाधिकारी को देनी होगी। संबंधित रजिस्टर एवं अन्य अभिलेख सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनका सत्यापन, निरीक्षण और लेखा परीक्षण किया जा सके।
यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब मलबे और स्क्रैप की निकासी के लिए इतनी विस्तृत निगरानी व्यवस्था जरूरी थी तो ध्वस्तीकरण की शुरुआत से ही इसे लागू क्यों नहीं किया गया? करीब तीन-चौथाई काम पूरा होने के बाद जारी हुआ आदेश अब उससे पहले परिसर से बाहर जा चुकी सामग्री के हिसाब-किताब को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
गौरतलब है कि ध्वस्तीकरण के दौरान जमीन की गहराई तक खुदाई कर आरबीएमनुमा सामग्री निकाले जाने की शिकायतों के बाद एसडीएम और महाप्रबंधक स्तर से जांच शुरू हो चुकी है। जांच में ध्वस्तीकरण, खुदाई और निकली सामग्री के निस्तारण से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की जा रही है।
ऐसे में ध्वस्तीकरण शुरू होने से 18 सितंबर तक की अवधि जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई है। इस दौरान परिसर से कितना मलबा, लोहा, ईंट, लकड़ी और अन्य स्क्रैप बाहर गया, कितने वाहनों से सामग्री निकाली गई, वाहनों की संख्या क्या थी, सामग्री की मात्रा कितनी थी और उसे कहां भेजा गया,इन सवालों का जवाब उपलब्ध रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है।
18 सितंबर के आदेश में अब वाहन संख्या से लेकर चालक के नाम, सामग्री की मात्रा, समय और संयुक्त हस्ताक्षर तक दर्ज करना अनिवार्य किया गया है। ऐसे में यह जानना भी जांच का अहम हिस्सा होगा कि इससे पहले की निकासी के लिए क्या इसी तरह का कोई रिकॉर्ड तैयार किया गया था। यदि रिकॉर्ड उपलब्ध है तो उसका मिलान मौके से निकली सामग्री और वाहनों की आवाजाही से किया जा सकता है। यदि रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं है तो पहले की निकासी का सत्यापन किस आधार पर होगा, यह भी जांच के दायरे में आ सकता है।
करीब 75 फीसदी काम पूरा होने के बाद निगरानी व्यवस्था सख्त किए जाने से यह सवाल भी सामने है कि अब लागू व्यवस्था पहले ही बाहर जा चुकी सामग्री का पूरा हिसाब किस तरह सामने लाएगी। यही वजह है कि मौजूदा निगरानी के साथ ध्वस्तीकरण की शुरुआत से 18 सितंबर तक के रिकॉर्ड की जांच भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
हालांकि विभागीय जांच पूरी होने से पहले किसी भी अनियमितता को प्रमाणित मानना उचित नहीं होगा। जांच के बाद ही शिकायतों की वास्तविकता और जिम्मेदारी की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल सवाल 18 सितंबर को लागू की गई निगरानी व्यवस्था पर नहीं, बल्कि उसके समय और उससे पहले हुई सामग्री की निकासी के हिसाब पर है।
अब देखना होगा कि जांच में 18 सितंबर से पहले की निकासी, उपलब्ध रजिस्टर, मुख्य गेट के रिकॉर्ड, वाहनों की आवाजाही और ध्वस्तीकरण से प्राप्त सामग्री के निस्तारण का किस स्तर तक सत्यापन किया जाता है।