अमेरिका- इजराइल- ईरान युद्ध के चलते गहराने लगा है वैश्विक ऊर्जा संकट, भारत सरकार बड़ी रणनीति बनाने में जुटी
नई दिल्ली।
अमेरिका और इजराइल की ईरान के साथ छिड़ी जंग के बीच अब विश्वभर में ऊर्जा संकट गहराने लगा है। मध्य पूर्व एशिया में लगातार बढ़ रहे इस भू-राजनीतिक तनाव के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता की स्थिति पैदा हो गई है। भारत को भी इस संकट का सामना करना पड़ सकता है । इसी आशंका के दृष्टिगत भारत सरकार पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों को नियंत्रित रखने तथा देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक रणनीति पर काम कर रही है।
बताया जा रहा है कि ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरू मध्य से गुजरने वाले डीजल, पेट्रोल व एल पीजी गैस टैंकरों के आवागमन पर रोक लगा दी है गई है, जिससे विश्वभर में 40 फीसदी सप्लाई प्रभावित हो गई है । भारत की भी अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतें इसी समुद्री मार्ग से पूरी होती हैं। ऐसे में केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय हालात पर लगातार नजर रखते हुए है और ईंधन आपूर्ति और भंडारण व्यवस्था को मजबूत करने में जुटी है।
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो गई है, और कच्चे ईंधन के दाम दस फीसदी तक बढ़ गए हैं ।हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर भारत समेत दुनिया की चिंता बढ़ी हुई है, क्योंकि विश्व की बड़ी तेल आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरती है। यदि यहां किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में और भी उछाल तय माना जा रहा है।
सरकारी आंकलन के अनुसार भारत के पास फिलहाल कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार लगभग 25 दिनों की जरूरत पूरी करने में सक्षम है, जबकि पेट्रोल और डीजल का स्टॉक करीब तीन सप्ताह तक चल सकता है। संभावित संकट को देखते हुए सरकार ने अग्रिम तैयारी शुरू कर दी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार पेट्रोल और डीजल के निर्यात को सीमित करने की रणनीति पर भी विचार कर रही है, ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता प्रभावित न हो। तेल विपणन कंपनियों को पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने के निर्देश कम्पनियों को दिए गए हैं ।
ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए भारत रूस सहित अन्य देशों से अतिरिक्त कच्चे तेल आयात के विकल्पों पर भी काम कर रहा है। बीते वर्षों में रियायती दरों पर तेल आयात भारत के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण मौजूदा संकट में अहम भूमिका निभाएगा।
एल पी जी – एल एन जी आपूर्ति भी चिंता का विषय
भारत की गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। समुद्री परिवहन प्रभावित होने की स्थिति में एलपीजी और एलएनजी आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। इसे देखते हुए सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने पर जोर दे रही है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो महंगाई, परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर तत्काल हस्तक्षेप किया जाएगा ।
परिवहन लागत बढ़ने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाओं को देखते हुए निर्यात क्षेत्र को भी सतर्क किया गया है। सरकार ने उद्योग जगत को आवश्यक वित्तीय एवं नीतिगत सहयोग देने का आश्वासन दिया है।
बहरहाल मध्य पूर्व का मौजूदा संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गम्भीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन भारत ने समय रहते रणनीतिक कदम उठाकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को संतुलित रखने की दिशा में तैयारी तेज कर दी है। वस्तुतः निकट भविष्य में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम देश और दुनिया की दिशा तय करेंगे।